बाढ़ में डूबा बिहार केंद्र ने 1 रुपया नहीं दिया, पाली का सेंटर भी छीन लिया, सौतेले हैं हम?
बिहार इस साल एक बार फिर बाढ़ की गंभीर स्थिति से गुजर रहा है। कई जिलों में बाढ़ ने लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित किया है। केंद्र की टीम ने प्रभावित इलाकों का जायजा लिया। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी बिहार का दौरा किया।
ऐसे में राज्य को उम्मीद थी कि केंद्र सरकार की ओर से राहत और पुनर्वास के लिए किसी बड़े पैकेज की घोषणा होगी। लेकिन अब तक ऐसा कोई बड़ा विशेष राहत पैकेज सामने नहीं आया है।
यहीं से सवाल उठता है कि क्या बिहार को केंद्रीय राहत में उसका उचित हिस्सा मिल रहा है?
SDRF में बिहार को अब तक कितना पैसा मिला?
इस सवाल का जवाब आंकड़ों में तलाशना जरूरी है।
भारत सरकार के प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो यानी PIB की 1 अगस्त 2026 की प्रेस रिलीज के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए राज्य आपदा मोचन बल यानी SDRF में केंद्र के हिस्से की पहली किस्त जारी की गई थी।
इसमें अरुणाचल प्रदेश को 44.55 करोड़ रुपये, असम को 379.35 करोड़ रुपये और गुजरात को 500 करोड़ रुपये दिए गए। महाराष्ट्र को भी 500 करोड़ रुपये जारी किए गए, जबकि ओडिशा के लिए दूसरी किस्त के तौर पर 500 करोड़ रुपये की घोषणा की गई।
इस सूची में बिहार का नाम नहीं था।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। SDRF की राशि राज्य सरकारों को तय प्रक्रिया के तहत मिलती है। इसमें राज्य की ओर से प्रस्ताव, पहले जारी रकम के उपयोग का हिसाब और उपयोगिता प्रमाणपत्र जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।
इसलिए केवल रकम जारी न होने के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि केंद्र ने बिहार को जानबूझकर पैसा नहीं दिया।
लेकिन सवाल यह जरूर है कि बिहार के मामले में प्रक्रिया कहां तक पहुंची है और राज्य को राहत राशि कब मिलेगी?
गुजरात को पांच महीने में करीब 1,278 करोड़ रुपये
केंद्रीय राहत को लेकर तुलना करने पर तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है।
13 मार्च 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली समिति ने 2025 में बाढ़, आकस्मिक बाढ़, बादल फटने, चक्रवात और भूस्खलन से प्रभावित कई राज्यों के लिए 1,912.99 करोड़ रुपये के अतिरिक्त राहत पैकेज को मंजूरी दी थी।
इसमें गुजरात को 778.67 करोड़ रुपये, आंध्र प्रदेश को 341.48 करोड़ रुपये और छत्तीसगढ़ को 15.70 करोड़ रुपये मिले।
इसके बाद अगस्त 2026 में SDRF के तहत गुजरात को 500 करोड़ रुपये और जारी किए गए।
यानी इन दो घोषणाओं को देखें तो पांच महीने के भीतर गुजरात के लिए करीब 1,278 करोड़ रुपये की राशि सामने आती है।
इसके उलट, 29 जुलाई 2026 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने SDRF के तहत बिहार के लिए आवंटित राशि में से कोई रकम जारी नहीं होने की जानकारी दी थी।
यही अंतर बिहार में राजनीतिक सवाल खड़ा कर रहा है।
बिहार के 42 सांसद और आठ केंद्रीय मंत्री
इस बहस का एक राजनीतिक पक्ष भी है।
केंद्र की मौजूदा मोदी सरकार में बिहार के 42 सांसद हैं, 30 लोकसभा और 12 राज्यसभा सदस्य। बिहार से आठ केंद्रीय मंत्री भी हैं।
ऐसे में सवाल सिर्फ केंद्र सरकार से नहीं पूछा जाना चाहिए।
सवाल बिहार के इन सांसदों और मंत्रियों से भी है कि जब राज्य बाढ़ जैसी आपदा का सामना कर रहा है, तब दिल्ली में बिहार के लिए कितनी मजबूती से आवाज उठाई जा रही है?
हालांकि इसका जवाब भी राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि सरकार के आधिकारिक आंकड़ों और आगे होने वाली घोषणाओं से ही मिलेगा।
पाली भाषा का सेंटर बिहार में क्यों नहीं?
बाढ़ राहत के सवाल के बीच एक दूसरा फैसला भी बिहार में चर्चा का विषय बन गया है।
1 अक्टूबर 2026 को शिक्षा मंत्रालय ने पांच शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण, शोध और डिजिटलीकरण के लिए सेंटर फॉर एक्सीलेंस स्थापित करने की मंजूरी दी।
इनमें असमिया, बंगाली, पाली, मराठी और प्राकृत शामिल हैं।
प्रस्ताव के मुताबिक—
- असमिया का केंद्र असम की तेजपुर यूनिवर्सिटी में होगा।
- बंगाली का केंद्र पश्चिम बंगाल की विश्व भारती यूनिवर्सिटी में होगा।
- मराठी का केंद्र पुणे के डेक्कन कॉलेज पोस्ट ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में होगा।
- प्राकृत का केंद्र गुजरात सेंट्रल यूनिवर्सिटी में होगा।
- जबकि पाली का केंद्र ओडिशा सेंट्रल यूनिवर्सिटी में स्थापित किया जाएगा।
यहीं से बिहार में सवाल उठ रहा है कि पाली का केंद्र बिहार में क्यों नहीं बनाया गया?
पाली और बिहार का संबंध कितना पुराना है?
पाली को लेकर इतिहास और भाषाविज्ञान में कई मत हैं।
यह मानना कि पाली की उत्पत्ति सीधे तौर पर बिहार में ही हुई, एक निर्विवाद तथ्य नहीं है। पाली की उत्पत्ति और उसके विकास को लेकर विद्वानों के बीच लंबे समय से बहस होती रही है।
हालांकि पाली के इतिहास को प्राचीन मगध और उत्तर-पूर्वी भारतीय भाषाई परंपरा से जोड़ने वाले कई मत मौजूद हैं।
बौद्ध साहित्य के अध्ययन में पाली का विशेष महत्व है। त्रिपिटक सहित बौद्ध साहित्य का बड़ा हिस्सा पाली में उपलब्ध है और श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड तथा अन्य बौद्ध देशों में आज भी पाली का अध्ययन किया जाता है।
बिहार के लिए इसका महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि बौद्ध परंपरा से जुड़े कई सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल इसी राज्य में हैं—बोधगया, राजगीर, नालंदा और वैशाली।
इसलिए पाली को बिहार की ऐतिहासिक और बौद्ध विरासत से जोड़कर देखना स्वाभाविक है।
पाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने की मांग बिहार ने की थी
यहां सरकारी दस्तावेज एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखते हैं।
3 अक्टूबर 2024 को केंद्र सरकार ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने की घोषणा की थी।
उस समय जारी सरकारी प्रेस रिलीज में कहा गया था कि बिहार सरकार ने पाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने का प्रस्ताव दिया था।
भाषाविज्ञान विशेषज्ञ समिति ने भाषा के इतिहास, प्राचीन साहित्य, ग्रंथों, पुरालेखीय और शिलालेखीय प्रमाण तथा उसके प्रभाव क्षेत्र जैसे मानकों के आधार पर प्रस्ताव का अध्ययन किया था।
समिति की रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि पाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलने से शैक्षणिक और शोध के क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं और इससे बिहार को लाभ होगा।
यहीं पर मौजूदा फैसला एक सवाल खड़ा करता है।
अगर पाली को लेकर बिहार सरकार ने प्रस्ताव दिया था और समिति ने इसके संभावित लाभों में बिहार का उल्लेख किया था, तो पाली के सेंटर फॉर एक्सीलेंस के लिए ओडिशा को क्यों चुना गया?
इस सवाल का स्पष्ट जवाब अभी सार्वजनिक बहस में सामने नहीं आया है।
क्या ओडिशा का चयन गलत है?
यहां एक और सावधानी जरूरी है।
सिर्फ इसलिए कि पाली का संबंध बिहार की ऐतिहासिक विरासत से है, यह जरूरी नहीं कि उसका शोध केंद्र भी बिहार में ही होना चाहिए।
सरकार यह तर्क दे सकती है कि सेंटर फॉर एक्सीलेंस का उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर शोध और संरक्षण को बढ़ावा देना है और अलग-अलग राज्यों में संस्थान स्थापित करने से भाषाई अध्ययन का विस्तार होगा।
लेकिन तब एक दूसरा सवाल उठता है।
अगर असमिया का केंद्र असम में, बंगाली का केंद्र पश्चिम बंगाल में और मराठी का केंद्र महाराष्ट्र में स्थापित किया जा रहा है, तो पाली के लिए बिहार को क्यों नहीं चुना गया?
यही वह बिंदु है जहां शिक्षा मंत्रालय की ओर से स्पष्ट कारण सामने आना महत्वपूर्ण हो जाता है।
दो फैसले, एक बड़ा सवाल
बाढ़ राहत और पाली भाषा के केंद्र—दोनों मामले अलग हैं।
एक सीधे तौर पर आपदा राहत और वित्तीय सहायता से जुड़ा है, जबकि दूसरा भाषा, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से।
फिर भी बिहार में दोनों को एक साथ देखा जा रहा है।
एक तरफ राज्य बाढ़ से जूझ रहा है और SDRF से केंद्रीय हिस्से की राशि को लेकर सवाल हैं।
दूसरी तरफ पाली जैसी भाषा के लिए सेंटर फॉर एक्सीलेंस बिहार की जगह ओडिशा में स्थापित किया जा रहा है।
क्या इसे बिहार के साथ सौतेला व्यवहार कहा जा सकता है?
इसका अंतिम जवाब अभी जल्दबाजी में देना उचित नहीं होगा।
क्योंकि बाढ़ राहत के मामले में सरकारी प्रक्रिया और आगे जारी होने वाली राशि महत्वपूर्ण होगी। वहीं पाली सेंटर के मामले में केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि स्थान के चयन के लिए कौन से मानदंड अपनाए गए और बिहार को क्यों नहीं चुना गया।
लेकिन सवाल उठाने के लिए पर्याप्त आधार जरूर मौजूद हैं।
और इन सवालों का जवाब बिहार की जनता को मिलना चाहिए।
बिहार को राहत कब मिलेगी?
SDRF की राशि जारी करने में देरी क्यों हुई?
पाली का सेंटर बिहार की जगह ओडिशा में क्यों बनाया जा रहा है?
और सबसे बड़ा सवाल कि
क्या बिहार की राजनीतिक ताकत के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर उसकी आवाज उतनी प्रभावी है, जितनी होनी चाहिए?
इन सवालों का जवाब सरकार और बिहार के जनप्रतिनिधियों को देना है।
