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बिहार की सियासत में ‘खेला’: अपनों के चक्रव्यूह में घिरी BJP, नीतीश की JDU संभालेंगे निशांत?

कन्हैया भेलारी, खबर प्वाइंट: बिहार की राजनीति इन दिनों बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव, आंतरिक गुटबाजी और बढ़ते अपराध के मुद्दों को लेकर बेहद गर्म है. अगर हम सूबे के ताजा सियासी घटनाक्रमों का गहराई से विश्लेषण करें, तो सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही अजीबोगरीब अंतर्विरोधों से घिरे नजर आते हैं.

बांकीपुर उपचुनाव: अपोजिशन से ज्यादा खुद बीजेपी ही दोनों तरफ से लड़ रही?

बांकीपुर उपचुनाव को लेकर बीजेपी की जो चुनावी रणनीति दिख रही है, उस पर मुझे महाभारत के ‘बरबरीक’ का प्रसंग याद आता है. जब बरबरीक से पूछा गया कि युद्ध में कौन किसको मार रहा है, तो उसने कहा था कि मुझे तो सिर्फ कृष्ण का सुदर्शन चक्र चलता दिखाई दे रहा है. आज बांकीपुर की राजनीति देखकर भी यही लगता है कि यहाँ बीजेपी ही दोनों तरफ (पक्ष और विपक्ष) से लड़ रही है और हर जगह वही हावी है.

पार्टी के स्टार प्रचारकों की सूची को ही देख लीजिए. जिस क्षेत्र में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या महज 10 से 12 हजार के करीब है, वहाँ 7-7 ब्राह्मण स्टार प्रचारक (अश्विनी चौबे, मनोज तिवारी, मंगल पांडे, सतीश चंद्र दुबे आदि) उतार दिए गए हैं. जबकि इस क्षेत्र में सबसे बड़ी आबादी कायस्थ समाज की है, लेकिन पार्टी ने इस समाज के प्रमुख नेताओं जैसे ऋतुराज सिन्हा, अजय आलोक और संजय मयूक को लिस्ट से ही गायब कर दिया. बीजेपी के ही कुछ सूत्रों का कहना है कि यह लिस्ट खुद मुख्यमंत्री या नितिन नवीन के प्रभाव में तय की गई है, जिससे पार्टी के भीतर ही भारी असंतोष और सिरफुटौवल की स्थिति है.

तेजस्वी गायब, ‘मायावती’ की राह पर RJD?

बंटी यादव हत्याकांड मामले में पप्पू यादव और प्रशांत किशोर (PK) पीड़ित परिवार से मिलने पहुंच गए, लेकिन नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का कहीं अता-पता नहीं है. सच तो यह है कि आरजेडी इस उपचुनाव में कहीं रेस में दिख ही नहीं रही है. बिहार में राजद के नेता अब उत्तर प्रदेश की मायावती की तरह हो गए हैं, जो पूरी तरह ‘मैनेज’ हो चुके हैं. भले ही राजद नेता ऊपरी मन से रेखा गुप्ता को वोट देने की अपील कर रहे हों, लेकिन धरातल पर राजद कार्यकर्ताओं का मन इस चुनाव में बिल्कुल नहीं लगा है.

JDU ऑफिस में निशांत कुमार की एंट्री: क्या पार्टी संभालने की है तैयारी?

जदयू से हाल ही में निष्कासित किए गए छोटू सिंह और नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के बीच हुई बंद कमरे की मुलाकात ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है. मेरा शुरू से यह मानना रहा है कि छोटू सिंह ने कोई ऐसा बड़ा गुनाह नहीं किया था कि उन्हें सीधे पार्टी से ही निकाल दिया जाता. पार्टी के कुछ नेताओं (संजय गांधी, श्रवण कुमार, उमेश कुशवाहा) ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर नीतीश कुमार को गलत ब्रीफिंग दी थी.

लेकिन अब निशांत कुमार का लगातार जदयू दफ्तर आना एक बड़ा सियासी संकेत है. दरअसल, निशांत को भी लग रहा है कि वर्तमान नेतृत्व पार्टी को समाप्त करने पर तुला हुआ है, जिसका कोई भविष्य नहीं दिख रहा. यही वजह है कि निशांत अब संगठन के कार्यों में गहरी रुचि (Keen Interest) ले रहे हैं. यह जदयू के लिए एक अच्छी बात हो सकती है, क्योंकि यदि छोटू सिंह के मामले में निशांत अपने पिता (नीतीश कुमार) से बात कर लेते हैं, तो फिर पार्टी में किसी की हिम्मत नहीं है जो छोटू सिंह की वापसी रोक सके.

बंटी यादव केस और बिहार पुलिस का ‘हाफ एनकाउंटर’

बंटी यादव मामले के आरोपी का पुलिस द्वारा जो ‘हाफ एनकाउंटर’ (पैर में गोली मारना) किया गया है, वह सिर्फ एक बोलचाल का शब्द बन चुका है. कानून का राज स्थापित होना चाहिए, चाहे कोई कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो, पुलिस को अपने हाथ में कानून लेने या एनकाउंटर करने का अधिकार नहीं है. बंटी यादव के परिजनों के साथ कोतवाली थाने में शुरुआत में जो दुर्व्यवहार हुआ, उसने पुलिस के कैरेक्टर पर फिर सवाल खड़े किए हैं. चुनावी माहौल के चलते प्रशांत किशोर और विपक्षी नेता इस मुद्दे को उठा रहे हैं, जिससे सरकार और पुलिस प्रशासन दोनों कटघरे में आ खड़े हुए हैं.

गांवों में टैक्स: सरकार का खजाना खाली?

सम्राट सरकार द्वारा हाल ही में ग्रामीण क्षेत्रों में पक्के मकानों पर ₹50 से ₹5000 तक का होल्डिंग टैक्स लगाने का जो कैबिनेट फैसला लिया गया है, वह पूरी तरह ‘जनविरोधी’ (Anti-People) है. इससे साफ है कि सरकार का खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है और दिल्ली से भी पर्याप्त आर्थिक मदद नहीं मिल रही है. यहाँ तक कि विधायकों को उनका फंड तक जारी नहीं हो पा रहा है. एक तरफ सरकार मुफ्त बिजली देने की बात करती है और दूसरी तरफ किसानों व ग्रामीणों की जेब पर डाका डाला जा रहा है, जिससे गांवों में सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पनप रहा है.

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